नमस्कार साथियों यदि आप भी बिहार बोर्ड से इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा 2026 में देने वाले हैं और आपका भी पढ़ाई अभी तो कुछ खास नहीं हो पाया है तो प्यारे साथियों आपके लिए बहुत इंपॉर्टेंट आर्टिकल होने जा रहा है क्योंकि आपको इस आर्टिकल में इतिहास का 27 वैसे सब्जेक्टिव क्वेश्चन आंसर देने वाले हैं जो कि आपका परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं तो आप इस आर्टिकल को शुरू से लेकर अंत तक पढ़िएगा अगर आप इस आर्टिकल को शुरू से लेकर अंत तक पढ़ लेते हैं तो आपको परीक्षा में काफी फायदा होने वाला है क्योंकि यहां से 10 से 20 सब्जेक्टिव क्वेश्चन हो बहू परीक्षा में यही से आने वाला है
Q.1. हड़प्पा सभ्यता के पतन के प्रमुख कारणों का वर्णन करें।
Ans. हड़प्पा सभ्यता कैसे समाप्त हुई, इसको लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। फिर भी इसके पतन के निम्नलिखित कारण दिये जाते है-
सिन्धु क्षेत्र में आगे चलकर वर्षा कम हो गयी। फलस्वरूप कृषि और पशुपालन में कठिनाई होने लगी।कुछ विद्वानों के अनुसार इसके पास का रेगिस्तान बढ़ता गया। फलस्वरूप मिट्टी में लवणता बढ़ गयी और उर्वरता समाप्त हो गयी। इसके कारण सिंधु सभ्यता का पतन हो गया। कुछ लोगों के अनुसार यहाँ भूकंप आने से बस्तियाँ समाप्त हो गयी।कुछ दूसरे लोगों का कहना था कि यहाँ भीषण बाढ़ आ गयी और पानी जमा हो गया। इसके कारण लोग दूसरे स्थान पर चले गये।एक विचार यह भी माना जाता है कि सिंधु नदी की धारा बदल गयी और सभ्यता का क्षेत्र नदी से दूर हो गया।
Q.2. पुरातत्व से आप क्या समझते हैं? Or, उत्खनन से आप क्या समझते हैं?
Ans. पुरातत्व वह विज्ञान है जिसके माध्यम से पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुई सामग्रियों की खुदाई कर अतीत के लोगों के भौतिक जीवन का ज्ञान प्राप्त करना। किसी भी सभ्यता के इतिहास को जानने में पुरातत्व एक महत्वपूर्ण एवं विश्वसनीय स्रोत है। हड़प्पा सभ्यता का ज्ञान पुरातत्व पर ही आधारित है। पुरातत्व में मिली उपकरणों, औजारों, धातु, पदार्थों, बर्तनों आदि के आधार पर लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्तर के बारे में पुरातत्वविद् निष्कर्ष निकालते हैं।उत्खनन से व्रिभिन्न सभ्यताओं की प्राचीनता का पता चलता है। पुरातात्विक वस्तुएँ जितनी गहराई पर प्राप्त होती हैं वे उतनी ही प्राचीन होती हैं। इसे काल निर्णय में स्तरीकरण का सिद्धान्त कहा जाता है।
Q.3 . हड़प्पा वासियों द्वारा व्यवहृत सिंचाई के साधनों का वर्णन करें।
Ans. अधिकांश हड़प्पा स्थल अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में स्थित है। जहाँ संभवतः कृषि के लिए सिंचाई की आवश्यकता पड़ती होगी। अफगानिस्तान में सौतुगई नामक हड़प्पा स्थल से नहरों के कुछ अवशेष मिले हैं, परन्तु पंजाब और सिंध में नहीं। ऐसा संभव है कि प्राचीन नहरें बहुत पहले ही गाद से भर गई थीं। ऐसा भी हो सकता है कि कुओं से प्राप्त पानी का प्रयोग सिचाई के लिए किया जाता हो। इसके अतिरिक्त धौलावीरा (गुजरात) में मिले जलाशयों का प्रयोग संभवतः कृषि के लिए जल संचयन हेतु किया जाता था।
Q.4. C-R 37 से आप क्या समझते हैं?
Ans. हड़प्पा नगर-क्षेत्र की दक्षिण दिशा में सिन्धु सभ्यता के काल का एक कब्रिस्तान मिला है जिसे ‘समाधि आर-37’ (Cemetry R-37) नाम दिया गया है। यहाँ पर प्रारम्भ में माधी स्वरूप वत्स और तत्पश्चात् सन् 1946 में ह्वीलर ने उत्खनन कराया था।
Q.5. इतिवृत (Chronical) क्या है?
Ans. इतिवृत्त घटनाओं का अनवरत कालाक्रमिक विवरण है। इतिवृत्त मुगल राज्य की संख्याओं के बारे में तथ्यात्मक सूचनाओं का खजाना था, जिन्हें दरवार से घनिष्ठ रूप से जुड़े व्यक्तियों द्वारा काफी परिश्रम से एकत्रित एवं वर्गीकृत किया गया था। आधुनिक इतिहासकारों के मूल पाठ की इस शैली को क्रॉनिकल्स या इतिवृत्त का नाम दिया गया।
Q.6. हड़प्पा सभ्यता की सड़क व्यवस्था पर प्रकाश डालें।
Ans. हड़प्पा सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता उसकी सड़कें थीं। यहाँ की प्रमुख
सड़के 9.15 मीटर चौड़ी थी जिसे पुरातत्वविदों ने राजपथ कहा है। गलियाँ 4 फीट तक चौड़ी होती थी। सड़कें सीधी दिशा में एक-दूसरे को समकोण पर काटती हुई नगर को अनेक वर्गाकार अथवा चतुर्भुजाकार खण्डों में विभाजित करती थीं। इस पद्धति को ‘ऑक्सफोर्ड-सर्कस’ नाम दिया गया। सड़कें मिट्टी की बनी थीं किन्तु इनकी सफाई की अच्छी व्यवस्था थी। इस प्रकार कूड़ा-करकट एकत्रित करने के लिए स्थान-स्थान पर गड्ढे खोदे जाते अथवा कूड़ा पात्र रखे जाते थे। मोहनजोदड़ो की एक सड़क के दोनों किनारों पर चबूतरे बने हुए मिले हैं। सम्भवतः इन पर बैठकर दुकानदार वस्तुओं की बिक्री किया करते थे।
Q.7. सिन्धु घाटी सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता क्यों कहा जाता है?
Ans. सिन्धु घाटी सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस
सभ्यता की खोज-1921 ई० में सर्वप्रथम हड़प्पा नामक स्थान से हुई थी। हड़प्पा संस्कृति का विस्तार पंजाब, सिंध, राजस्थान, गुजरात तथा बलुचिस्तान के हिस्सों और पश्चिमी उत्तर
प्रदेश के सीमावर्ती भाग तक था।
Q.8. हड़प्पा सभ्यता एक शहरी सभ्यता थी, कैसे?
Ans. हड़प्पा सभ्यता एक शहरी सभ्यता थी। इसके अन्तर्गत अनेक नगरों के अवशेष मिलें हैं जिसमें हड़प्पा, मोहनजोदड़ों, लोथल आदि प्रमुख हैं।मोहनजोदड़ों हड़प्पा सभ्यता का सबसे अनूठा नियोजित शहरी केन्द्र था। यह सबसे प्रसिद्ध पुरास्थल है यद्यपि इसकी खोज हड़प्पा से बाद ही हुई।मोहनजोदड़ों शहर को नियोजकों ने दो भागों में विभाजित किया है। एक भाग छोटा है लेकिन वह हिस्सा अधिक ऊँचाई पर बनाया गया है और दूसरा भाग अधिक बड़ा है लेकिन नीचे बनाया गया। पुरातत्वविदों ने इन्हें क्रमशः दुर्ग और निचला शहर का नाम दिया है।मोहनजोदड़ों का दूसरा भाग अर्थात् निचला शहर भी दीवार से घेरा गया था। इसके अलावा अनेक मकानों को ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया था जो नींव का काम करते थे।मोहनजोदड़ों शहर का सम्पूर्ण भवन-निर्माण कार्य चनुतरों पर एक निश्चित क्षेत्र तक सीमित था। ऐसा इसलिए जान पड़ता है कि पहले बस्ती का नियोजन किया गयाथां’ और फिर उसके अनुसार कार्यान्वयन।
Q.9. हड़प्पा लिपि के बारे में आप क्या जानते हैं? Or, हड़प्पा लिपि की विशेषताएँ बताएँ।
Ans. हड़प्पा लिपि को रहस्यमय कहा गया है क्योंकि इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका। इस प्रकार इसका रहस्य अभी तक बना हुआ है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
यह लिपि वर्णमालीय नहीं थीं। यह ऐसे चिह्नों (चित्रों) वाली थी जो किसी विशेष स्वर या व्यंजन को व्यक्त नहीं करती। इस लिपि के चिह्नों की संख्या 375 से 400 के बीच है। यह लिपि दाई ओर से बाई ओर लिखी जाती थी। इसका संकेत इस बात से मिलता है कि मुहरों पर इसकी लिखावट में दाई ओर चौड़ा अंतराल है, जबकि बाईं ओर संकुचित है जैसे कि लिखते समय बाई ओर स्थान कम पड़ गया हो। इस लिपि की लिखावट बहुत-सी वस्तुओं पर मिली है। इसका अर्थ यह लगाया जाता है कि साक्षरता व्यापक रूप में थी।
Q.10. मोहनजोदड़ों के विशाल स्नानागार का वर्णन करें।
Ans. सिंधु घाटी के लोगों ने अनेक प्रकार के भवनों का निर्माण किया। रहने के मकानों के अतिरिक्त उन्होनें अनेक सार्वजनिक भवनों का निर्माण किया। इन सार्वजनिक भवनों में
सबसे मुख्य मोहनजोदड़ों का स्नानागार था जिसका बाहरी घेरा (180×180) फीट है। इस तालाब की आन्तरिक लम्बाई 39 फीट, चौड़ाई 23 फीट और गहराई 8 फीट है। इसके चारों ओर काफी बरामदे बने हुए हैं। इस तालाब के पास एक कुँआ है जिसका पानी इस तालाब को भरने के लिए प्रयोग में लाया जाता था। तालाब पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। गन्दे पानी को निकालने के लिए तालाब में अलग रास्ता था। अनुमान लगाया जाता है कि यह तालाब धार्मिक अवसरों पर नहाने के लिए बनाया गया था। इस तालाब की मजबूती का आधार यह है कि हजारों वर्षों से बिना नष्ट हुए यह लगभग वैसा-का-वैसा ही बचा है।2. राजा, किसान और नगर (आरम्भिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ)
Q.11. इतिहास लेखन में अभिलेखों का क्या महत्व है?
Ans. अभिलेख उन्हें कहते हैं जो पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे हुए होते हैं। अभिलेखों में उन लोगों की उपलब्धियाँ, क्रियाकलाप या विचार लिखे जाते हैं, जो उन्हें बनवाते हैं। अभिलेख की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- राजाओं के क्रियाकलाप तथा महिलाओं और पुरूषों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को दिये गये दान का व्यौरा होता है।अभिलेख एक प्रकार से स्थायी प्रमाण होते हैं। कई अभिलेखों में इनके निर्माण की तिथि भी खुदी होती है।जिन अभिलेखों पर तिथि नहीं मिलती है, उनका काल निर्धारण आमतौर पर पुरालिपि अथवा लेखन शैली के आधार पर काफी सुस्पष्टता से किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, लगभग 250 ई० पू० में अक्षर ‘अ’ प्र जैसा लिखा जाता था और 500 ई० में यह ‘प’ जैसा लिखा जाता था।प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत भाषाओं में लिखे जाते थे। प्राकृत उन भाषाओं को कहा जाता था जो जनसामान्य की भाषाएँ होती थीं।
Q.12. मौर्यकालीन इतिहास के प्रमुख स्त्रोतों का उल्लेख कीजिए।
Ans. मौर्य वंश के इतिहास की जानकारी साहित्यिक और पुरातात्विक दोनों स्रोत से होती है। साहित्यिक स्रोतों में यूनानी यात्री मेगस्थनीज द्वारा लिखा गया वृतांत और कौटिल्य का अर्थशास्त्र महत्वपूर्ण है। इसके साथ परवर्ती जैन, बौद्ध, पौराणिक ग्रंथ तथा संस्कृत वाडगमय से भी सहायता मिलती है। पुरातात्विक स्रोतों में अशोक के अभिलेख महत्वपूर्ण है। ये अभिलेख अशोक के विचारों की अच्छी जानकारी देते हैं। इसमें उसके धर्म के प्रचार का भी उल्लेख है।
Q.13. अशोक के धम्म के बारे में आप क्या जानते हैं?
Ans. अशोक का धर्म संकीर्णता से बहुत दूर और साम्प्रदायिकता से बहुत ऊपर उठा हुआ था। लेकिन अशोक के धार्मिक विचारों तथा सिद्धान्तों में क्रमागत विकास हुआ था।कलिंग युद्ध के पहले अशोक ब्राह्मण धर्म को मानने वाला था। वह माँस भी खूब खाता था। राजमहल में असंख्य पशु-पक्षियों का प्रतिदिन वध होता था। लेकिन कलिंग युद्ध के बाद उसके विचारों में महान् परिवर्तन हो गया। वह हिंसा को तिलांजलि देकर अहिंसा का सदैव के लिए अनन्य भक्त बन गया। इसके लिए उसने ब्राह्मण धर्म को छोड़ दिया और बौद्ध धर्म को अपना लिया। अशोक ने अपने धर्म से साम्प्रदायिकता का अन्त कर अपने धर्म में विश्व के सभी धर्मों के महत्त्वपूर्ण तत्त्वों को ग्रहण किया और इसको विश्व-धर्म में स्थान देने की कोशिश की।
धर्म की उन्नति: अशोक ने अपने धम्म की उन्नति के लिए इसका व्यापक प्रचार करवाया। इस उद्देश्य से उसने निम्नलिखित कार्य किए-
- (1) उसने धर्म के सिद्धान्तों को शिला-लेखों पर खुदवाया।
- (2) उसने धर्म महामात्रों की नियुक्ति की। ये कर्मचारी राज्य में घूम-घूमकर लोगों में धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करते थे।
- (3) उसने धर्म के नियमों को स्वयं अपनाया ताकि लोग उससे प्रभावित होकर इन नियमों
- को अपनाएँ।
- (4) उसने अपने सभी कर्मचारियों को लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया।
Q.14. मौर्य प्रशासन की जानकारी दें।
Ans. मेगास्थनीज के वृतान्त से पता चलता है कि पाटलिपुत्र जैसे बड़े नगरों के लिए विशेष नागरिक प्रबंध की व्यवस्था की गई थी। इस नगर के लिए बीस सदस्यों की एक समिति थी, जो बोर्डों में विभक्त की गई थी। प्रत्येक बोर्ड में पाँच सदस्य होते थे। ये बोर्ड निम्नलिखित ढंग से अपना कार्य करते थे-
पहले का कार्य कला-कौशल की देखभाल करना, कारीगरों के सिर्फ वेतन नियत करना और दुःख में सहायता करना आदि था। दूसरे का कार्य विदेशियों की देखभाल करना, उनके लिए सुख-सामग्री उपलब्ध कराना तथा उनकी निगरानी रखना आदि था। तीसरे बोर्ड का कार्य जन्म-मरण का हिसाब रखना था ताकि कर लगाने तथा अन्य प्रबंध करने में सुविधा रहे। चौथे का कार्य व्यापार का प्रबंध करना। पाँचवे का कार्य शिल्पालयों में बनी वस्तुओं की देखभाल करना। छठे बोर्ड का कार्य वस्तुओं की बिक्री पर लगे हुए विक्रय कर को एकत्र करना था।
Q.15. चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य की उपलब्धियों का वर्णन करें।
Ans. चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की गिनती भारत के योग्य सम्राटों में की जाती है। वह एक सफल तथा महान विजेता था। वह साहसी व्यक्ति था। वह कठिन परिस्थितियों में भी अपने धैर्य को नहीं खोता था। उसने अपने बाहुबल से गुप्त साम्राज्य का विस्तार कर उसकी अनन्त सेवा की जिसके फलस्वरूप गुप्त साम्राज्य की नींव कभी कमजोर नहीं हुई। वह एक बेजोड़ सेनानायक था। वह अपने देश में विदेशियों को देखना नहीं चाहता था। इसलिए उसने उनको यहाँ से खदेड़ दिया था।कुटनीतिज्ञता के क्षेत्र में भी वह अद्वितीय था। वह अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए सुकर्म और कुकर्म कुछ भी नहीं समझता था। उसने एक नारी का वेश धारण कर शंक राजा की हत्या की और अपने ज्येष्ठ भ्राता रामगुप्त का बध कर मगध की गद्दी को प्राप्त किया तथा ध्रुवदेवी को अपनी पत्नी बनाया। उसने अन्य देशों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपने सोम्राज्य को सुदृढ़ किया। उसके इन सभी कार्यों से यह पता चलता है कि वह उच्च कोटि का कूटनीतिज्ञ था। उसमें एक अच्छे शासक के सभी गुण वर्तमान थे। उसकी शासन व्यवस्था बहुत अच्छी थी। वह न्याय प्रिय व्यक्ति था जिसके फलस्वरूप उसके साम्राज्य में शान्ति और सुव्यवस्था थी। उसके शासन काल में अपराध बहुत कम होता था। धर्म के क्षेत्र में वह उदार था। स्वयं तो वह ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था लेकिन अन्य धर्मो से उसको घृणा नहीं थी। उसने दरबार में सभी तरह के धर्मावलम्बियों को भी प्रश्रय दे रखा था क्योंकि उसका एक सेनापति बौद्ध था तो उसका संधि विग्रह मन्त्री शिव भक्त था।उसको साहित्य तथा साहित्यकारों से विशेष प्रेम था। उसका राज दरबार विद्वानों से खचाखच भरा रहता था। विद्वानों और कलाकारों को वह हर तरह से मदद किया करता था। उसके नवरत्नों में भी कालीदास, भवभूति और धन्वन्तरी आदि विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। उनके शासन काल में संस्कृत भाषा की बहुत उन्नति हुई। अतः उपरोक्त विशेषताओं के आधार पर यह कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य कुशल तथा ख्यातिप्राप्त सम्राट था।
0.16. मौर्यकालीन कला की विशेषताएँ बताएँ।
Ans. मौर्यों के काल में कला के रूप तथा विषयों को बहुमुखी प्रतिभा प्राप्त हुई और आगामी युग की कला पर इसका प्रभाव पड़ा। इस काल की कला की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-इस युग के स्मारकों, स्तूपों आदि पर जो लेप (ओप) किया गया है वह आज भी यथावत है। भाव प्रकाशन तथा प्रदर्शन में पूर्ण समर्थता है। कठोर पाषाण को काटकर, छाँटकर बनाये गये स्तम्भों की निर्माण शैली मौलिक है और इसके प्रतीक तथा अन्य चिह्न कलात्मक यथार्थता से ओत-प्रोत है। लोक कला की शैली प्रभावशाली, अभूतपूर्व और मौलिक है।
Q.17. ‘स्तंभ लेख’ क्या है?
Ans. ‘स्तंभ लेख’ साधारणतः आंतरिक प्रदेशों में पाए जाते हैं और ये धर्म प्रचार के प्रयोग में लाए गए है जो निम्नलिखित हैं-
दो तराई स्तंभ लेख : नेपाल की तराई में स्थित इन स्तंभ लेखों में अशोक की बौद्ध के तीर्थस्थानों की यात्राओं का वर्णन है।सप्त स्तंभ लेख: ये सात स्तंभ लेख छः स्थानों पर पाए जाते हैं, जिनमें से दो दिल्ली के निकट स्थित है। इनमें धर्म प्रचार के उपायों का वर्णन किया गया है।चार लघु स्तंभ लेख : इनमें से दो साँची तथा सारनाथ की लाटों पर तथा दो प्रयाग में अंकित हैं। अनुमान है कि इन्हें बौद्ध धर्म में व्याप्त मतभेदों को दूर करने के लिए खुदवाया गया था।
0.18. महाजनपद से आप क्या समझते हैं?
Ans. महाजनपद को प्रायः आरम्भिक राज्यों, नगरों, लोहे के बढ़ते प्रयोग और सिक्कों के विकास के साथ जोड़ा जाता है। इसी काल में बौद्ध तथा जैन सहित विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं का जन्म हुआ। बौद्ध और जैन धर्म के आरम्भिक ग्रन्थों में महाजन पद के नाम से 16 राज्यों का उल्लेख मिलता है। यद्यपि महाजनपदों के नाम की सूची इन ग्रन्थों में समान नहीं है किन्तु मगध वज्जि, कुरू, कोशल, पांचाल, गांधार और अवन्ति जैसे नाम प्रायः मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि इन जनपदों का विशेष महत्व था। प्रत्येक महाजनपद की एक राजधानी होती थी जो प्रायः किलों से घिरी होती थी।
Q.19. सातवाहन कौन थे?
Ans. दक्कन और मध्य भारत में मौर्यों के उत्तराधिकारी सातवाहन हुए। इस वंश के शासक अपने अपको ब्राह्मण मानते थे। इसके साथ वे स्वयं को क्षत्रिय शासकों का नाश करने वालै बताते थे।
Q.20. प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोतों के रूप में सिक्कों का महत्त्व लिखें।
Ans. प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत के रूप में, सिक्कों का अपना विशेष महत्त्व है।
प्राचीन काल के बहुत से सिक्के मिले हैं। ये सिक्के कई राजवंशों की तिथियाँ स्पष्ट करने में केवल हमारी सहायता नहीं करते, बल्कि कई प्रकार से इतिहास को जानने में भी हमारी सहायता करते हैं। हिन्द बैक्ट्रिया (Indo-Bactrian) और हिन्द यूनानी (Indo-Greek) काल का इतिहास बताने वाले तो केवल सिक्के ही हैं। इसी प्रकार समुद्रगुप्त के समय के सिक्के हमें बताते हैं कि वह विष्णु का पुजारी था। सिक्कों पर बना वीणा का चित्र वह सिद्धकरता है कि समुद्रगुप्त गायन विद्या का प्रेमी था। इसी प्रकार शक “जाओं (The Saka Rulers) के विषय में भी सिक्के हमारी बड़ी सहायता करते हैं। ये सिक्के हमें उस समय की आर्थिक दशा और राजाओं के राज्य विस्तार आदि के बारे में भी हमारी सहायता करते हैं।
Q.21. गांधार कला की विशेषताओं का उल्लेख करें।
Ans. गांधार शैली भारतीय कला के विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। सम्भवतः गांधार कला का अविर्भाव द्वितीय शताब्दी ई० पू० तक हो चुका था। कनिष्क के शासनकालमें गांधार कला अपने चर्मोत्कर्ष पर पहुँच गयी थी। गांधार कला के प्रमुख केन्द्र थे-तक्षशिला तथा पुरुषपुर आदि। यह यूनानी तथा भारतीय शैली का समन्वय है।गांधार कला की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
(a) गांधार कला की विषय-वस्तु भारतीय तथा तकनीक यूनानी है। (b) गांधार कला में निर्मित मूर्तियाँ साधारणतया स्लेटी पत्थर में है। (c) भगवान बुद्ध के बाल यूनान तथा राम की शैली में बनाये गये है। (d) मूर्तियों में शरीर के अंगों को ध्यानपूर्वक बनाया गया है। मूर्तियों में मोटे तथा सिल्वटदार वस्त्र प्रदर्शित किये गये हैं। (e) गांधार शैली में धातु कला तथा आध्यात्म कला का अभाव है। (1) गांधार शैली में बुद्ध अपोलो देवता के समान लगतेहैं। यह सम्भवतः यूनानी प्रभाव के कारण है।
Q.22. समुद्रगुप्त की विजयों के बारे में लिखें।
Ans. समुद्रगुप्त ने उत्तरी भारत के नौ राजाओं पर विजय प्राप्त की और उनके राज्यो को अपने साम्राज्य में मिला लिया। उन राजाओं के नाम निम्नलिखित हैं- संद्रदेव, मातिल, नागदत्त, चन्द्रवर्धन, गणपतिनांग, नागसेन, अच्युत, नन्दी तथा बलवर्धन।
Q.23. अशोक के अभिलेखों पर टिप्पणी लिखें।
- Ans. अशोक के अभिलेख इतिहासकारों के लिए अमूल्य निधि है। इन स्तम्भों पर तीन प्रकार के राज्यादेश मिले हैं-
- (i) इनमें सबसे प्रसिद्ध सात स्तम्भ राज्यादेश (The Seven Pillars Edicts) हैं जो दिल्ली, मेरठ, इलाहाबाद, राजपुरवा (बिहार), लोरिया ऐराज (बिहार) आदि स्थानों पर पाएं गये हैं। इनमें अशोक के धर्म व नीति का वर्णन है।
- (ii) दूसरी प्रकार के लेख लघु स्तम्भ राज्यादेश (The Minor Pillar Edicts) के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये सारनाथ (बनारस), साँची (भोपाल), इलाहाबाद आदि स्थानों पर मिले हैं।
- (iii) तीसरी प्रकार के तराई के स्तम्भ लेख (The Tarai Pillar Edicts) हैं जो रूमिन्दी और निगलिवा (नेपाल की तराई) में पाये गये हैं। इनमें अशोक द्वारा महात्मा बुद्ध की जन्मभूमि देखने हेतु यात्रा का वर्णन है।
Q.24. श्रीमद्भगवद्गीता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Ans. भगवद्गीता महाभारत का सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश है। ‘भगवद्गीता’ का शाब्दिक अर्थ है- ‘भगवान् का गीत’। वास्तव में यह भगवान् का गीत ही है। लगभग सभी हिन्दू परिवारों में इसका पाठ किया जाता है। इस ग्रंथ में 18 अध्याय हैं। इसकी मूल भाषा संस्कृत है। परन्तु आज इसका विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण अर्जुन के सारथी (रथवान) बने थे। कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में कौरवों तथा पांडवों की सेनाएँ युद्ध लड़ने के लिए आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन नेकौरवों की सेना में अपने सगे-संबंधियों को देखकर युद्ध करने से इंकार कर दिया। वह अपने हाथों से अपने भाइयों तथा अन्य संबंधियों को नहीं मारना चाहता था। ऐसे अवसर पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म करने का उपदेश दिया। यही उपदेश इतिहास में ‘गीता’ के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीकृष्ण का उपदेश सुनकर अर्जुन ने अपना धनुषबाण उठा लिया। युद्ध आरंभ हो गया जिसमें पांडव विजयी हुए। भगवद्गीता से यह शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को फल की चिंता किए बिना अपना कर्म करना चाहिए।
Q.25. ‘त्रिपिटक’ के विषय में आप क्या जानते हैं?
Ans. त्रिपिटक का शाब्दिक अर्थ है-तीन टोकरियाँ जिनमें कि पुस्तक रखी जाती हैं। बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् उनके अनुयायियों ने उनकी शिक्षाओं का संकलन तीन पिटकों सुत्तपिटक, विनयपिटक एवं अभिधम्मपिटक में किया। इन्हें संयुक्त रूप से त्रिपिटक कहा जाता है।सुत्तपिटक में बुद्ध धर्म के सिद्धान्त मिलते हैं। विनयपिटक में बुद्ध धर्म के आचार-विचार एवं नियम मिलते हैं। अभिधम्मपिटक में बुद्ध का दर्शन मिलता है
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