Q.1. भारत के वर्तमान बहुदलीय व्यवस्था के क्या फायदे हैं?
Or, बहुदलीय व्यवस्था क्या है?
Ans. भारत में बहुदलीय प्रणाली है और विभिन्न दल विचारों के विकास में भारत में बहुदलीय प्रणाली उपयोगी सिद्ध हो रही है। बहुदलीय प्रणाली में एक दल का प्रभुत्व नहीं होता। इसमें दो से अधिक दल होते हैं। भारत में अनेक जातीय एवं धार्मिक समुदायों के कारण बहुदलीय व्यवस्था अपनाई गई है।
भारत में राजनीतिक दलों की अधिकता के कारण यह प्रणाली अपनाई गई है। वर्तमान समय में केंद्र तथा विभिन्न राज्यों में गठबंधन सरकारें बन रही हैं। इसके निम्नलिखित लाभ हैं –
(i) जनता के अधिक प्रतिनिधित्व का अवसर – बहुदलीय प्रणाली के कारण भारतीय लोकतंत्र में जनता को अधिक प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है। इस प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता होती है।
(ii) विपक्ष को अधिक महत्व – बहुदलीय प्रणाली में विपक्ष को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है और इसे आलोचना के लिए अधिक स्वतंत्रता होती है। सत्ताधारी दल की यदि अपनी गलती होती है तो वह उसकी आलोचना कर सकते हैं।
(iii) राष्ट्रीय एकता की भावना – बहुदलीय प्रणाली से विभिन्न धर्म, जाति, भाषा आदि को राष्ट्रीय एकता की भावना से जोड़ा जा सकता है।
(iv) लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकास – बहुदलीय प्रणाली से भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकास होता है।
Q.2. गठबंधन (गठबन्धन) सरकार से आप क्या समझते हैं? इसके लाभ एवं हानियाँ स्पष्ट कीजिए।
Ans. विभिन्न राजनीतिक दलों की राजनीति में तालमेल से ऐसी सरकारें बनती हैं जिन्हें गठबंधन सरकार कहा जाता है। जब कोई दल स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं कर पाता तब 2 या 2 से अधिक दल आपसी समझौते के अनुसार सरकार बनाते हैं। ऐसी सरकारों को गठबंधन सरकार कहते हैं।
1989 के बाद भारतीय राजनीति में एक नया युग प्रारंभ हुआ और भारत में गठबंधन सरकारें बनने लगी। केंद्र सरकार में भी गठबंधन सरकार 1989 में बनी और राज्य स्तर पर भी 1996 से गठबंधन सरकारों का निर्माण होने लगा।
गठबंधन सरकार के लाभ –
- सभी दलों को प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है।
- राजनीति में छोटे-छोटे दलों को भी सरकार में काम करने का अवसर मिलता है।
- लोकतंत्र की भावना को बल मिलता है।
- जनहित के कार्यों में सहमति होती है।
गठबंधन सरकार की हानियाँ –
- निर्णय लेने में विलंब होता है।
- कार्यों की गति धीमी हो जाती है।
- शक्तिशाली नेतृत्व का अभाव होता है।
- स्पष्ट निर्णय नहीं आ पाता।
- राष्ट्रीय हितों का स्पष्ट रूप से अर्थ में लागू नहीं हो सकता।
- निर्णय लेने में कठिनाई।
- विदेश नीति निर्धारण में प्रभाव।
Q.3. सुशासन क्या है? इसके विशेषताएँ बताइए।
Ans. प्रशासन को और अच्छे ढंग से संचालन करने के लिए जब व्यस्थित रूप से ढांचे तैयार किए जाते हैं जो आम जनता को न्यायसंगत शासन प्रणाली प्रदान करें तो इसे सुशासन कहा जाता है। सुशासन के माध्यम से पुलिस की कार्यप्रणाली, चिकित्सा की सुविधाएं, शिक्षा व्यवस्था तथा स्वास्थ्य जैसे अनेक सेवाओं को बेहतर बनाया जाता है।
अर्थात् प्रशासन की वह कार्यप्रणाली जिसके द्वारा जनता के हितों के लिए आवश्यक निर्णयों को प्रेरणा रूप आदि माध्यमों से लागू किया जाता है उसे सुशासन कहा जाता है।
जब शासन, प्रशासन, नीति निर्धारण, निर्णय निर्माण, योजनाओं, कार्यों में पारदर्शिता, जवाबदेही, सूचना का अधिकार, सुचना का प्रचार-प्रसार, नागरिकों की भागीदारी, समयबद्ध कार्य प्रणाली, सक्षमता एवं प्रभावशीलता, सहिष्णुता, समन्वय, सेवा भावना, उदारता आदि विशेषताओं का समावेश हो तो उसे सुशासन कहा जाता है। सुशासन को ‘गुड गवर्नेंस’ (Good Governance) भी कहा जाता है।
सारांशतः जन कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना में प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और अगर प्रशासन उत्तरदायी, पारदर्शी, न्यायोचित, उत्तरदायी एवं संवेदनशील हो, तभी हम सुशासन की स्थापना कर सकते हैं।
Q.4. भ्रष्टाचार एवं घोटाले लिखिए।
घोटालों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका वर्णन करें।
Ans. भ्रष्टाचार का तात्पर्य है किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर अवैध तरीके से धन, वस्तु या सुविधा प्राप्त करना। भ्रष्टाचार का स्वरूप इस प्रकार है – रिश्वत लेना, बेईमानी, गलत दस्तावेज़ बनाना, अनावश्यक विलंब करना, अनुचित लाभ देना, भाई-भतीजावाद, पक्षपात, असत्य दस्तावेज़ बनाना इत्यादि।
यदि देवी-देवताओं को धन द्वारा प्रसन्न किया जा सकता है तो सिविल कर्मचारियों के क्यों नहीं किया जा सकता? आज- समाज में व्यक्तिगत लाभ लेने के लिए राजनेता, अधिकारी, व्यापारी आदि भ्रष्ट कार्यों को अंजाम देते हैं, जिससे यह सामाजिक-आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न करता है।
Q.5. किन्तु शक्तियों के अधिकार का वर्णन कीजिए।
मुख्यमंत्रियों की शक्तियों के विवेचन कीजिए।
Ans. मुख्यमंत्री राज्य सरकार का प्रधान होता है। राज्य के प्रशासन का प्रधान कोई और नहीं है। मुख्यमंत्री के निर्णय के द्वारा ही राज्य स्तर की प्रशासनिक शक्तियाँ निर्धारित होती हैं।
मुख्यमंत्री की शक्तियाँ निम्न प्रकार से हैं:
(i) मुख्यमंत्री राज्य मंत्रिपरिषद् में विभागों का बंटवारा करता है एवं अपने स्तर के अनुसार उनके कार्यों की निगरानी करता है।
(ii) मुख्यमंत्री मंत्रिपरिषद् की बैठक बुलाता है।
(iii) मुख्यमंत्री राज्यपाल को परामर्श प्रदान करता है। मुख्यमंत्री की निर्णय क्षमता ही मंत्री परिषद् की कार्यप्रणाली निर्धारित करती है।
(iv) मंत्रियों के कार्यों की निगरानी मुख्यमंत्री करता है और उनका निर्णय करता है।
(v) राज्य के प्रशासनिक प्रमुख के रूप में मुख्यमंत्री की भूमिका राज्य की नीति निर्धारण एवं विकास में विशेष योगदान रखती है।
निष्कर्ष – मुख्यमंत्री राज्य का कार्यपालिका प्रमुख होने के कारण बड़ी भूमिका निभाता है। अनुच्छेद 167 के अनुसार मुख्यमंत्री का कर्तव्य है कि वह राज्यपाल को प्रशासन और विधायी कार्यों की जानकारी नियमित रूप से देता रहे।
मुख्यमंत्री के कार्य एवं अधिकार निम्नलिखित हैं –
- एक मंत्रीपरिषद् का गठन करता है और मंत्रीपरिषद् के बैठक का संचालन करता है।
- राज्यपाल के कार्यों में परामर्श देता है और नियुक्तियों में अनुशंसा करता है।
- मंत्री अपने कार्यों के लिए मुख्यमंत्री को उत्तरदायी होता है।
- मुख्यमंत्री विधायिका के प्रति उत्तरदायी होता है।
Q.6. जिला परिषद् के गठन व उसके कार्यों का वर्णन करें।
Ans. जिला परिषद् का गठन : बिहार पंचायत राज अधिनियम, 1993 के अनुसार जिनमें में जिला परिषद् का गठन होगा। जिला परिषद् के गठन का प्रावधान निम्न है –
(i) क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र का निर्धारण: प्रत्येक जिला परिषद् क्षेत्र में ऐसे क्षेत्र निर्धारित किए जाएंगे जिसमें 50,000 की जनसंख्या के निर्धारण पर क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र निर्धारित किया जाएगा। क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र से एक सदस्य निर्वाचित होगा। जिला परिषद् में ऐसे सदस्य होंगे जो प्रत्येक पंचायत समिति से निर्वाचित होंगे।
(ii) जिला परिषद् के सदस्य पंचायत समितियों के प्रमुख।
(iii) सांसदों और राज्य विधानसभाओं के ऐसे सदस्य जो जिला के किसी भाग या पूरे जिला का प्रतिनिधित्व करते हों, वे पदेन सदस्य होंगे। ये सदस्यों की कुल संख्या का 25% से अधिक नहीं होंगे।
(iv) राज्य सरकार द्वारा जिला परिषद् के दो सदस्य जो सामाजिक कार्यों के क्षेत्र में अनुभवी हों, को मनोनीत किया जाएगा।
जिला परिषद् के कार्य –
(i) जिला परिषद् विकास समिति के बजट का निर्धारण करती है और उसे अपनी मंजूरी देती है।
(ii) यह जिला के सर्वांगीण विकास हेतु सरकार को सुझाव देती है।
(iii) यह योजनाओं को प्राथमिकता निर्धारण के लिए विशेष समिति बनाती है।
(iv) यह जिला समिति के कार्यों पर निगरानी करती है और परिषद् को वर्ष में दो बार रिपोर्ट करती है।
(v) यह दो या दो से अधिक पंचायत समितियों से संबंधित विकास योजनाएं बनाती है एवं कार्यान्वयन कराती है।
Q.7. भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के उदय के कारणों का वर्णन करें।
Or, भारतीय जनता पार्टी पर एक टिप्पणी लिखिए।
Ans. भारतीय जनता पार्टी का उदय 1980 में भारतीय जनसंघ के स्थान पर हुआ। भारत में भारतीय जनता पार्टी की सरकार अनेक राज्यों में बन चुकी है। 1984 के लोकसभा चुनाव में इस पार्टी को 2 सीटें प्राप्त हुईं। 1989 के बाद से इस दल ने अपना विस्तार किया और यह कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभरा। कर्नाटक, गुजरात, बिहार, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में एक प्रमुख शक्तिशाली दल के रूप में उभरी। वर्तमान लोकसभा में इसके कुल प्रतिनिधि 88 सदस्य हैं।
1991 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी दूसरे नंबर पर रही। 1996 के संसदीय चुनाव में यह सबसे बड़ी पार्टी बनी और केंद्र में इसकी सरकार 13 दिन की बनी। 1998 के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी जो पूरे 20 महीने चली। फिर 1999 के चुनाव में पुनः राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में आया और पुनः अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। 1998 में भी चुनाव हुआ, जिसमें इसने बहुमत प्राप्त किया।
Q.8. भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
Ans. भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
भारतीय संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है जिसमें व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा, स्वतंत्रता एवं समानता की गारंटी दी गई है। भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
- लिखित संविधान
- संघात्मक संरचना
- धर्मनिरपेक्षता
- न्यायपालिका का गणराज्य रूप
- संसदीय शासन प्रणाली
- नीति निदेशक तत्व
- न्याय, स्वतंत्रता, समता एवं बंधुत्व
- संविधान की सर्वोच्चता
भारतीय संविधान लचीला एवं कठोर दोनों प्रकार का है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि यह देश को एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण प्रदान करता है।
Q.9. राज्य के नीति निदेशक तत्वों को स्पष्ट करें।
(Explain the Directive Principles of State Policy)
Ans. भारतीय संविधान के भाग 4 में राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का उल्लेख किया गया है। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों के अंतर्गत राज्य द्वारा देश के प्रशासन में इस प्रकार व्यवस्था की गई है कि वह नीति-निर्देशक तत्व के अंतर्गत स्थान देते हुए उस पर यह उत्तरदायित्व स्वीकार किया गया कि वह नीति-निर्माण कार्य में संविधान के अनुरूप कार्य करेगा।
इन तत्वों का उद्देश्य आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक न्याय स्थापित करना है। इन तत्वों में राज्य की यह नैतिक जिम्मेदारी निर्धारित की गई है कि वह देश के सभी नागरिकों के लिए समान अवसर की व्यवस्था करे तथा उचित जीवन स्तर प्रदान करे।
नीति निर्देशक तत्वों को संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक किया गया है।
Q.10. लोकसभा के संगठन और कार्यों का वर्णन करें।
Ans. लोकसभा भारतीय संसद का निचला सदन है। लोकसभा भारत की प्रमुख सत्ता और निर्णय लेने वाली संस्था है। लोकसभा प्रत्येक पाँच वर्षों के लिए होती है। संविधान के अनुसार भारत में अधिकतम लोकसभा सदस्यों की संख्या 552 है जिसमें 530 सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, 20 सदस्य संघ राज्य क्षेत्रों का और 2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।
लोकसभा के प्रमुख कार्यों में बजट पास करना, विधि निर्माण करना, सरकार पर नियंत्रण रखना और मंत्रीमंडल की जिम्मेदारी तय करना शामिल है। लोकसभा में विपक्ष की बड़ी भूमिका होती है जो जनहित से जुड़े प्रश्नों को उठाता है। लोकसभा सरकार को उत्तरदायी बनाता है। लोकसभा सरकार के कार्यों की समीक्षा करता है।
Q.11. लोकसभा राज्यसभा की तुलना में अधिक शक्तिशाली है। वर्णन करो।
Ans. लोकसभा राज्यसभा की तुलना में अधिक शक्तिशाली है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –
- लोकसभा केवल भारत सरकार की राजनीति को प्रभावित करती है लेकिन राज्यसभा ऐसा नहीं कर सकती है।
- लोकसभा के विश्वास के आधार पर ही मंत्रिपरिषद कार्य करता है। यदि लोकसभा मंत्रिपरिषद के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे, तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है। जबकि राज्यसभा के पास यह अधिकार नहीं है।
- साधारण विधेयक के संबंध में लोकसभा का निर्णय अंतिम होता है।
- लोकसभा में धन विधेयक प्रस्तुत होता है और इसमें राज्यसभा का कोई विशेष अधिकार नहीं होता।
- लोकसभा की भूमिका देश के विकास और जनहित से जुड़ी होती है।
Q.12. राज्य क्या है? इसके तत्वों की विवेचना करो।
Ans. समाज की तरह राज्य भी मानव-जीवन का एक अत्यन्त आवश्यक और महत्वपूर्ण संगठन है। राज्य के बिना समाज में किसी देश का सुव्यवस्थित ढंग से जीवन और कार्य नहीं चल सकता है। राज्य एक सामाजिक संस्था है जिसकी आवश्यकता शांति और सुव्यवस्था कायम करने तथा नियमन सुनिश्चित करने के लिए होती है। राज्य अत्यन्त महत्वपूर्ण मार्ग दर्शक संस्था है।
राज्य वह संस्था है जो समाज में अनुशासन एवं नियंत्रण व्यवस्था सुनिश्चित करता है। यह समाज के नागरिकों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन करता है। इसकी आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि समाज में अराजकता, संघर्ष, हिंसा, असमानता जैसी समस्याएँ पैदा हो गई थीं। इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए राज्य की स्थापना की गई।
राज्य के तत्व (Elements):
- जनसंख्या (Population)
- भूमि (Territory)
- शासन (Government), तथा
- सम्प्रभुता (Sovereignty)
(1) जनसंख्या (Population): जनसंख्या का होना राज्य के लिए पहला और आवश्यक तत्व है। राज्य बिना जनसंख्या के नहीं हो सकता है। जनसंख्या वह मानव-समूह है जो एक निश्चित भू-भाग में निवास करता है और जिसका एक निश्चित शासन होता है।
(2) भूमि (Territory): राज्य की दूसरी आवश्यक विशेषता है भू-भाग। राज्य का निर्माण एक निश्चित भू-भाग पर होता है। इसी में राज्य का संपूर्ण कार्य-कलाप चलता है। इसी में राज्य के नागरिक निवास करते हैं। राज्य का सीमांकन स्पष्ट रूप से होना चाहिए ताकि उसकी प्रशासनिक इकाइयों को चलाने में सुविधा हो।
(3) शासन (Government): यह तीसरा आवश्यक तत्व है। शासन के बिना राज्य की कोई सत्ता नहीं होती। शासन की सहायता से ही राज्य अपने कार्यों को संचालित करता है।
(4) सम्प्रभुता (Sovereignty): सम्प्रभुता का तात्पर्य है राज्य की सर्वोच्च सत्ता। इसमें राज्य की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। उसे अपने निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त होती है।
Q.13. राज्य की उत्पत्ति की दैवी सिद्धांत का वर्णन करो।
(Describe the Divine theory of the origin of state.)
Ans. राज्य की उत्पत्ति का दैवी सिद्धांत कहता है कि राज्य की उत्पत्ति ईश्वर की इच्छा एवं कृपा से हुई है। राज्य के शासक को ईश्वर का प्रतिनिधि माना गया है। इस सिद्धांत के अनुसार राजा को राज्य के कार्यों के लिए केवल ईश्वर के समक्ष ही उत्तरदायी था। ईश्वर ने अधिकार के रूप में शासन और राज्य रूप में प्रभुता प्रदान किया। मध्य युग में विशेष रूप से इस धार्मिक अवधारणा में यह विचार फैलाया गया था। मुनियों विचारकों का यह एक प्रमुख सिद्धांत था जो चर्च द्वारा अपनाया गया था।
इस सिद्धांत के अनुसार राज्य मनुष्य द्वारा नहीं बल्कि ईश्वर द्वारा निर्मित है। इस विचारधारा के अनुसार राजा को ईश्वर का प्रतिरूप कहा गया और राजा के आदेश को ईश्वर का आदेश माना गया।
इस सिद्धांत की आलोचना करते हुए यह कहा गया कि राजा के अत्याचार से जनता को राहत का कोई उपाय नहीं था। अतः यह सिद्धांत जनतांत्रिक व्यवस्था का विरोधी था। आधुनिक युग में यह सिद्धांत अप्रासंगिक माना जाता है।
Q.14. नीति निर्देशक तत्वों की व्याख्या कीजिए।
Ans. नैतिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्व देने की संविधानकारों की अभिलाषा थी और दोनों की समान रूप से महत्वपूर्ण थे और दोनों का कार्य क्षेत्र एक जैसा था। नीति निर्देशक तत्व राज्य को प्रशासनिक दिशा निर्देश देने में सहायक होते हैं। ये नीति निर्देशक तत्व सम्पूर्ण भारतीय संविधान के निर्माण में –
(i) यह नीति निर्देशक तत्व राज्य-संविधान और समाजवाद को लक्ष्य देते हैं जो कि नीति निर्देशों का आधार है। ये नीति निर्देश शासन को निर्देश देते हैं कि लोकतंत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से शासन किस प्रकार चले।
(ii) नीति निर्देशक तत्व राज्य के समग्र विकास का प्रतिनिधित्व करते हैं।
(iii) नीति निर्देशक तत्व संविधान न्याय और राज्य के बीच के संबंध को जोड़ते हैं।
(iv) नीति निर्देशक तत्व के अंतर्गत आर्थिक और सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने की आकांक्षा की गई है।
Q.15. सर्वोच्च न्यायालय के स्वरूप एवं इसकी अन्य क्षेत्रीय विशेषताओं का वर्णन करें।
Ans. भारत के संविधान में न्यायपालिका स्वतंत्र एवं सर्वोच्च है। सर्वोच्च न्यायालय भारत की न्यायपालिका का शीर्षस्थ अंग है। इसका मुख्य कार्य संविधान की रक्षा करना और नागरिकों को न्याय दिलाना है।
(i) स्वरूप – सर्वोच्च न्यायालय का मुख्यालय दिल्ली में है। इसकी स्थापना 26 जनवरी 1950 को हुई थी। यह 25 न्यायाधीशों और एक मुख्य न्यायाधीश से मिलकर बनता है। इसका कार्यकाल 65 वर्ष की आयु तक सीमित है।
(ii) कार्य – यह संविधान की व्याख्या करता है। मूल अधिकारों की रक्षा करता है। इसके अलावा केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का निपटारा करता है। यह देश का सर्वोच्च न्यायिक अपीलीय निकाय है।
Q.16. 1975 के आपातकाल की संक्षिप्त जानकारी दें। यह क्यों लगाया गया और परिणामस्वरूप क्या हुआ?
Or, भारत में आपातकाल की घोषणा सन 1975 में क्यों की गई और इसके क्या परिणाम थे?
Ans. भारत में 1975 में आपातकाल की घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा की गई थी। इसके पीछे कारण थे –
(i) सरकार के विरुद्ध जन असंतोष बढ़ रहा था।
(ii) विपक्षी दल आंदोलन कर रहे थे और उनकी लोकप्रियता बढ़ रही थी।
(iii) इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा श्रीमती इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द किया गया था।
परिणाम –
- नागरिकों के मूल अधिकारों को स्थगित कर दिया गया।
- प्रेस की स्वतंत्रता खत्म कर दी गई।
- विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया।
- प्रशासन तानाशाही प्रवृत्ति का हो गया।
- लोकसभा का कार्यकाल बढ़ा दिया गया।
Q.17. उत्तर के नए स्रोत कौन-कौन से हैं? मूल्यांकन करें।
(What are the new sources of threats? Evaluate)
Ans. आज पूरे विश्व के देशों द्वारा सुरक्षा खतरे से निपटने के लिए तरह-तरह के साधनों का निर्माण तथा योजनाएं बनाई जा रही हैं। आज सुरक्षा के लिए जिन नए खतरे के स्रोतों से उत्पत्ति हो रही है वे खतरे मानवीय ही रक्षा से संबंधित न होकर राजनीतिक एवं आर्थिक भी होते हैं।
(i) आतंकवाद (Terrorism): आज विश्व में सबसे बड़ा खतरा आतंकवाद बन गया है। आतंकवाद के अत्यधिक प्रभाव में कई देश हैं। आतंकवाद के कारण देश की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति से ज्यादा रक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
(ii) मानवाधिकार हनन (Injuring Human Right): विभिन्न देशों द्वारा क्षेत्र मानवाधिकार हनन किया जाता है। मानवाधिकारों का रक्षा हेतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक संगठनों की स्थापना की गई है। परंतु कई बार मानवाधिकारों के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया जाता है।
(iii) वैश्विक गरीबी (Global Poverty): विश्व में गरीबी का एक अन्य स्रोत खतरा बना हुआ है। वैश्विक गरीबी के कारण अशांति, असुरक्षा, भुखमरी, असंतुलन, भेदभाव जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।
(iv) जलवायु परिवर्तन (Climate Change): पर्यावरणीय असंतुलन एवं जलवायु परिवर्तन से भी देशों की सुरक्षा प्रभावित हो रही है। इसके कारण प्राकृतिक आपदाओं की संख्या बढ़ रही है जिससे जन जीवन अस्थिर हो रहा है।