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Class 12th Hindi VVI Subjective Question 2026 – बिहार बोर्ड के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर देखें

नमस्कार साथियों यदि आप भी बिहार बोर्ड से इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा 2026 में देने वाले हैं तो आपके लिए यह बहुत महत्वपूर्ण आर्टिकल होने जा रहा है क्योंकि आपको इस आर्टिकल में कक्षा 12वीं का हिंदी का बहुत महत्वपूर्ण सब्जेक्टिव क्वेश्चन आंसर देने जा रहे हैं आपके ऊपर में क्वेश्चन और उसके नीचे में उसका उत्तर मिलेगा अगर आप इसको पूरा क्वेश्चन को अच्छे तरीका से पढ़ लेते हैं तो आपकी परीक्षा में यहां से चार या पांच क्वेश्चन डायरेक्ट आएंगे

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[1]मेरे प्रिय लेखक 

उत्तर, विश्व-साहित्य के इतिहास में ऐसे अनेकों लेखक उत्पन्न हुए हैं, जो अपने महान रचनाओं के कारण अमर हो गए हैं। आधुनिक युग में रवीन्द्रनाथ, टैगोर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, निराला, महादेवी, दिनकर, राहुल सांकृत्यायन, हरिवंश राय बच्चन, टॉलस्टॉय जैसे विश्वविख्यात लेखक हुए हैं, किन्तु मुझे अपनी भाषा हिन्दी में प्रेमचन्द सर्वाधिक प्रिय लेखक हैं। आज साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचन्द को उपन्यास सम्राट के रूप में स्मरण किया जाता है।
प्रेमचन्द ने आम जनता के जीवन को यथार्थ रूप में चित्रित किया, वस्तु, उसे प्रेरक बना दिया। उन्होंने अपने साहित्य में जनता की समस्याओं, किसानों, मजदूरों की पीड़ाओं, महिलाओं की दशा को सजीव रूप में चित्रित किया। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, लेख आदि के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया।
प्रेमचन्द ने पहली बार उपन्यास को यथार्थ धरातल, सामाजिक भूमि प्रदान की। जो उपन्यास केवल मनोरंजन के लिए लिखे जाते थे, प्रेमचन्द ने उन्हें उद्देश्यपूर्ण बना दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं में गोदान, गबन, सेवासदन, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला, कथा संग्रहों में मानसरोवर, सोजे वतन आदि में किसानों की दशा, महिलाओं की स्थिति, निम्न वर्ग के लोगों की समस्याओं को चित्रित किया। प्रेमचन्द का साहित्य युगबोध से भरा पड़ा है।

[2]छात्र और अनुशासन 

उत्तर, अनुशासन का सामान्य अर्थ है नियमों, निर्देश-समूह, विधि-विधान के अनुसार आचरण और व्यवहार करना। विद्यालय, महाविद्यालय, छात्रावास, खेलकूद, यात्राएँ, सामाजिक व्यवहार आदि सभी क्षेत्रों में अनुशासन का महत्व है। अनुशासन का पालन करना प्रत्येक छात्र का परम कर्तव्य है।
अनुशासन का पालन करनेवाले छात्र आजीवन सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचते हैं। अनुशासनहीन छात्र अपनी शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाते। छात्र जीवन में अनुशासन आवश्यक है। अनुशासन से छात्रों में आज्ञाकारिता, संयम, शिष्टता, साहस, आत्मविश्वास, आत्मनियंत्रण जैसे गुणों का विकास होता है।
यदि विद्यार्थी अनुशासित हों तो समाज में भरपूर शांति और व्यवस्था कायम रह सकती है। यदि समाज में कोई अनुशासन न रहे तो वहाँ अराजकता फैल जाती है। अनुशासन का पालन करना केवल छात्रों के लिए ही नहीं, वरन् सभी नागरिकों के लिए आवश्यक है। अनुशासन मनुष्य को सुशील और योग्य बनाता है। अतः सभी छात्रों को अनुशासन का पालन करना चाहिए। जो छात्र अनुशासन का पालन करते हैं, वे अपने कर्तव्य-निर्वहन, अध्ययन, खेलकूद आदि सभी क्षेत्रों में सफल होते हैं।

[3]मेरा प्रिय कवि 

उत्तर, आधुनिक हिन्दी साहित्य के कवियों में निराला का जीवन और साहित्य दोनों ही प्रेरक हैं। उनकी काव्ययात्रा अनेक संघर्षों से भरी है। उन्होंने भारतीय साहित्य को एक नवीन दिशा दी है।
निराला बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने गीत और गद्य की अनेक विधाओं में साहित्य सृजन किया है, पर विशेष रूप से गीत विधा का विशेष प्रभाव देखा गया।
निराला का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर में 1897 में हुआ। वे खड़ी बोली के उन्नायक और स्वतन्त्रचेता कवि थे। 1952 में उनका देहावसान हुआ।
निराला की कविताओं में सामाजिक क्रांति, राजनीतिक चेतना, आत्माभिव्यक्ति की तीव्रता, करुणा, विद्रोह और सौंदर्यबोध के दर्शन होते हैं। वे एक क्रांतिकारी कवि थे। उन्होंने छायावाद को नया मोड़ दिया।
उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ – परिमल, गीतिका, तुलसीदास, अणिमा, बेला, कुकुरमुत्ता, आदि हैं।
वे व्यक्तिगत शोषण, सामाजिक अन्याय, गरीबी, दरिद्रता आदि के विरुद्ध लिखते थे।
उनकी प्रसिद्ध पंक्ति “वह तोड़ती पत्थर” कवि की करुणा और विद्रोह का जीवंत उदाहरण है।
निराला का साहित्य मानवता की सच्ची सेवा है। उनकी रचनाएँ आज भी पाठकों को संघर्ष और हौसले की प्रेरणा देती हैं।

[3]छात्र और राजनीति 

उत्तर, विद्यार्थी का मुख्य कर्तव्य है विविध विषयों का ज्ञान प्राप्त करना तथा चरित्रबल एवं आत्मबल प्राप्त करना। विद्यार्थी का जीवन अनुशासनप्रिय, संयमी, सात्विक और सादा होना चाहिए।
आज के विद्यार्थी देश की भावी आशा हैं। देश की प्रगति के लिए उन्हें शिक्षित और जागरूक होना चाहिए।
राजनीति का जीवन में विशेष महत्व है। अपनी आवश्यकताओं के लिए और देश की उन्नति के लिए राजनीति का ज्ञान आवश्यक है।
वर्तमान युग में यदि विद्यार्थी राजनीति से दूर रहें, तो वे देश और समाज की समस्याओं के प्रति उदासीन बन जाते हैं। आर्थिक और सामाजिक अन्याय से लड़ने हेतु राजनीति का ज्ञान आवश्यक है।
यदि राजनीति के क्षेत्र में सुशिक्षित छात्र आएँगे तो वे समाज को उचित दिशा प्रदान करेंगे।
किन्तु छात्र राजनीति में अंध-भक्ति, मारपीट, आंदोलन, उपद्रव, हड़ताल आदि से दूर रहें।
उन्हें राजनीति के माध्यम से अपना देश और समाज हित में कार्य करना चाहिए।
छात्रों को राजनीति की समझ होनी चाहिए। राजनीति में प्रवेश उन्हें तभी करना चाहिए जब वे पूर्णतया परिपक्व हो जाएँ।
अन्यथा यह उनके छात्र जीवन और चरित्र निर्माण में बाधक सिद्ध हो सकता है।

[4]महँगाई 

उत्तर, महँगाई का अर्थ है उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों का तेजी से अत्यधिक बढ़ जाना।
1960 से आज तक महँगाई लगातार बढ़ रही है। दिन-प्रतिदिन आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ती जा रही हैं।
प्रारंभ में 1961 में गेहूँ का मूल्य ₹2 प्रति किलो था। आज वही ₹30 से ₹40 प्रति किलो हो गया है। दाल, तेल, चावल, चीनी, मसाले, दूध, सब्जियाँ सभी वस्तुएँ बहुत महँगी हो गई हैं।
महँगाई के कारण निम्न और मध्यम वर्ग का जीवन संकट में पड़ गया है। आज ₹500-₹1000 में भी एक सप्ताह का राशन नहीं आ पाता।
महँगाई का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, जमाखोरी, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और मुनाफाखोरी है।
महँगाई के कारण आम जनता का जीवन कठिन हो गया है। महँगाई की वजह से चोरी, डकैती, रिश्वत, अपराध, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी आदि बढ़ रहे हैं।
महँगाई रोकने के लिए आवश्यक है कि सरकार सख्त कदम उठाए।
आवश्यक वस्तुओं का वितरण नियंत्रण प्रणाली से हो।
जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगे, भ्रष्टाचार समाप्त हो। तभी महँगाई पर नियंत्रण किया जा सकता है।
महँगाई पर नियंत्रण देश की आर्थिक उन्नति के लिए आवश्यक है। इससे आम जनता को राहत मिलेगी और जीवन सुखद बन सकेगा। दूसरा कारण है कालाबाज़ारी और जमाखोरी।
व्यापारी आवश्यक वस्तुओं का भंडारण करते हैं, उन्हें गोदामों में बंद कर रखते हैं और खुले बाजार में उन वस्तुओं के दर्शन नहीं होते पर वे ही वस्तुएँ कालाबाज़ार में दुगने-तिगुने दामों पर सहज ही उपलब्ध हो जाती हैं।महँगाई का प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। विकास-योजनाओं का खर्च बढ़ जाता है। व्यक्ति, समाज और देश तीनों महँगाई के कारण दुःखी हैं, चिन्तित हैं। व्यक्ति की दैनिक जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध नहीं हैं, समाज में भ्रष्टाचार फैल रहा है, देश पर विदेशों से ऋण का बोझ बढ़ता जा रहा है। व्यक्ति और देश दोनों की कमर टूट रही है। महँगाई के संकट से निपटने से बचना है, उसकी गाज से अपनी रक्षा करनी है, तो ये उपाय अपनाने होंगे –

  • सख्ती से करों की चोरी रोकना,
  • कालाबाजार करने वालों को कठोर दंड देना,
  • जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगानी होगी,
  • सरकारी खर्चों को कम करना होगा,
  • राष्ट्रीयकृत उद्योगों के प्रबंधन तथा संचालन में कुशलता लानी होगी।

[5] बाढ़ की विभीषिका 

उत्तर, नदी का जल जब अपनी मर्यादा को तोड़कर अतिवाही हो जाए तो बाढ़ कहलाता है। वास्तव में जब वर्षा का जल नालों में, नदियों में यह कहकर आ न सके कि उस प्रकार अधिक हो जाए, तो बाढ़ उत्पन्न होती है।
बाढ़ प्राकृतिक तत्वों में है, तो उसे एक प्रकार की दैवी आपदा भी कह सकते हैं। अपनी राज्य सीमा में बयारों के सहारे बाढ़ आती है और उसकी विभीषिका से जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। बाढ़ से फसलों का नष्ट होना, मकानों का ढह जाना, जन और धन की हानि होना आम बात है।

बाढ़ का मुख्य अनुपयुक्त वर्षा होती है। पहाड़ों और अन्य उच्चतर स्थानों पर एक साथ अधिक मात्र में वर्षा होना और नदियों का उफन जाना बाढ़ के प्रमुख कारण हैं।
मानव अपनी मांग तथा आवश्यकता हेतु पेड़ के कटान के द्वारा जंगल की अंधाधुंध कटाई करता है। इससे जल का संचयन नहीं हो पाता और वर्षा के पानी को नदियाँ सँभाल नहीं पातीं।
इस प्रकार अत्यधिक वर्षा, अव्यवस्थित जल निकासी एवं वृक्षों के कटान से बाढ़ उत्पन्न होती है।
बाढ़ का सीधा प्रभाव किसानों पर पड़ता है। खेतों की तैयार फसलें पानी में डूब जाती हैं। अनाज सड़ जाता है। भूख से मनुष्य और पशु दोनों पीड़ित होते हैं। संक्रामक रोग फैलने लगते हैं। गाँव के गाँव बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं।

प्रत्येक वर्ष सरकार बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिए सहायता-पुनर्वास की व्यवस्था करती है। सेना के जवान लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाते हैं। बाढ़ के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए हमें वृक्षारोपण करना चाहिए, जल की उचित निकासी हेतु योजना बनानी चाहिए, वर्षा जल को रोककर उसका संचयन करना चाहिए।
बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है परंतु मनुष्य अपने स्वार्थ और सोच के कारण समाज के लिए संकट उत्पन्न करता है।
हमें सरकार की योजनाओं के साथ सहयोग करते हुए बाढ़ को रोकने के लिए उपाय अपनाने चाहिए। ऐसा न हो कि “हर साल यही होता है”, कि जून-जुलाई आते ही बाढ़ और तबाही आ जाए। हमें नदियों, नालों, नहरों का उचित नियंत्रण, तालाबों का संरक्षण और वृक्षारोपण को अपनाना चाहिए।

[6]रंग भेद / रंग भेदभाव / मूल्यांकन 

उत्तर, रंग व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिणाम होता है। जब रंग सच्चा नहीं होता, तो वह झूठ का प्रतीक बन जाता है।
रंग की तरफ उसका झुकाव हज़ारों वर्षों से चला आ रहा है, तथा गहरा व्यक्ति की आत्मा प्रवृत्ति की ओर ले जाता है। व्यक्ति हमेशा एक खूबसूरत दुनिया में रहना चाहता है, जहाँ उसे जीवन के रहस्यों और जटिलताओं से कोई खतरा नहीं होता।

वास्तविकता यह है कि जब समाज में रंग और राष्ट्र के विचारों में भेद होने लगता है, तो समाज विभाजन की ओर जाता है।
रंग भेद विकसित देशों पर देश के विश्वसनीय नागरिकों, राष्ट्र के उद्धारकों के प्रति संदेह और संशय पैदा करता है। इससे सामाजिक एकता नष्ट होती है।

समाज के लिए जरूरी है कि सभी लोगों को एक दृष्टि से देखा जाए, रंग या नस्ल के आधार पर भेद न किया जाए।
आज रंगभेद के कारण समाज में कई घटनाएँ घटती हैं। अफ्रीकी देशों के लोग या अमेरिका में बसे भारतीय नागरिक भी इसके शिकार होते हैं।
यदि हम समानता और समान अधिकार का समर्थन करते हैं, तो रंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
हर व्यक्ति को उसकी योग्यता और कार्य के आधार पर आँका जाना चाहिए, न कि रंग के आधार पर।

 

[7]पर्यावरण / पर्यावरण संरक्षण 

उत्तर, पर्यावरण” व्यापक शब्द है। इस शब्द का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव होता है।
हमारे चारों ओर जो वायु, जल, पृथ्वी, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि हैं – ये सभी हमारे पर्यावरण का हिस्सा हैं।
आज मानव अपने स्वार्थ में इतना लीन हो चुका है कि वह प्रकृति का दोहन कर रहा है। पेड़ों की कटाई, कारखानों का धुआँ चारों ओर हरियाली छा जाती है। तेज गर्मी से झुलसती भरती ठंडी और हरी-भरी हो जाती है।
वर्षा ऋतु जितनी सुखद है कभी वह उतनी ही दुखद भी बन जाती है। जब बहुत ज्यादा वर्षा होने लगती है तब मनुष्य के लिए वरदान के स्थान पर अभिशाप बन जाती है, नदियों में बाढ़ आ जाती है, खेत, धन, मकान, अनाज, पशु आदि की काफी हानि होती है। कई बार तो बाढ़ आने से लोगों को अपनी जान तक से हाथ धोना पड़ता है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ बाढ़ के कारण जानलेवा बन जाती है।

अन्त में हम यही कह सकते हैं कि वर्षा का विकराल रूप होने के बावजूद भी भरतीय किसान के लिए यह बहुत आवश्यक है। मानसून से होने वाली वर्षा ही भारतीय किसान का अन्न-धन से समृद्ध बनाती है। गर्मी से झुलसती धरती की प्यास बुझाती है। उसे हरियाली देती है, यह ऋतु मनुष्य के मन में कोमल भावनाओं को जागृत करती है। जुगनू चमकने लगते हैं तथा पपीहे पी-पी की आवाज करने लगते हैं। घातक पक्षी वर्षा का ही पानी पीकर अपनी प्यास बुझाता है।

[8]प्राकृतिक आपदा की त्रासदी 

उत्तर, धन-जन को व्यापक हानि पहुँचानेवाली आकस्मिक दुर्घटनाओं को प्राकृतिक आपदा कहते हैं। दीर्घकालीन क्षति पहुँचानेवाली आपदाएँ प्राकृतिक संकट कहलाती हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से प्रकृति से संघर्ष करते हुए ही मानव सभ्यताओं का विकास हुआ है, परन्तु ये संघर्ष सीमित क्षेत्रों में धीरे-धीरे होते रहे। फिर भी प्रकृति की असीम आसुरी शक्तियों के सम्मुख मनुष्य आज भी निरीह, असहाय और निस्तेज है। भूकंप, सुनामी इत्यादि प्रकोपों का सामना करने का दुःसाहस तो नहीं किया जा सकता, फिर भी इनके दुष्परिणामों को कम करने के उपाय किए जा सकते हैं। भारत प्राकृतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधताओं का देश है। इसकी विपुल जनसंख्या और विस्तृत क्षेत्र किसी-न-किसी आपदा से ग्रस्त होता रहता है। कोई क्षेत्र एक आपदा के लिए संवेदनशील है तो कोई दूसरी आपदा के लिए और कोई कई आपदाओं से एक साथ ग्रस्त हो सकता है। कई विनाशकारी आपदाएँ, जैसे-बाढ़, सूखा, भूकंप, सुनामी, चक्रवात, ओलावृष्टि,

[9]भूस्खलन, वज्रपात इत्यादि है

उत्तर, भ्रष्टाचार आजकल धन संग्रह एवं आवश्यक वस्तुओं के संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। यह एक ऐसी वस्तु हैं जो अत्यन्त विवेकी, शिक्षित एवं ईमानदार व्यक्ति की मति को भ्रष्ट कर देती है और मति-भ्रष्ट की बुद्धि विपरीत हो जाती है, किसी कार्य को करने में वह किंकतव्यविमूढ़ हो जाता है। समाज में असीम मान-प्रतिष्ठा को रखने वाले बड़े-बड़े व्यक्ति तथा साहूकार लोग आवश्यक वस्तुओं का संग्रह कर लेते हैं। इसी कारण नव वस्तुओं का अभाव हो जाता है। जनता सदैव त्यागः सेवा और परोपकार की प्रेमी होती है। जो व्यक्ति इन कार्यों को करते हैं, भ्रष्ट उपायों के द्वारा प्राप्त धन को निर्धनों में वितरण करते हैं, सार्वजनिक स्थलों का निर्माण कराते है उनमें अपने धन के स्रोत को छिपाने का स्वार्थ होता है।

आज हम नैतिक जीवन से बहुत दूर चले गए हैं। नैतिक आचार तो मानव समाज का भूषण माना जाता है। कहा भी गया है- “आचारः परमो धर्मः। अर्थात् आवार ही संबसे बड़ा धर्म है। प्राचीनकाल में सभी लोग इसको नैतिक जीवन का अनिवार्य अंग समझते थे। परन्तु आज नैतिकता का अभाव उसी प्रकार है जिस प्रकार शिशु-पाषाण। कारण यह है कि वर्तमान परिस्थितियों ऐसी हो गयी है जिनमें ईमानदारी, सत्यता, दान, कर्तव्यपरायणता का स्थान शून्य के बराबर है। कोई भी कार्य आज बिना रिश्वत और सिफारिश के सिद्ध नहीं होता। रिश्वतखोरी तो भारतीय समाज में ऐसे घुल गयी है जैसे पानी में नमक का घोल। इसी के कारण प्रतिष्ठित पदों पर योग्य व्यक्ति का स्थान नगण्य है।

[10] स्वच्छ भारत मिशन 

उत्तर, इस कार्यक्रम की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त, 2014 को लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में की थी। इसके तहत् 2019 में महात्मा गाँधी की 150 वीं जयन्ती तक देश को एक स्वच्छ भारत के रूप में प्रस्तुत करना है। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि पूज्य बापू ने Quit India Clean India का संदेश दिया था। देशवासियों ने पूज्य बापू के नेतृत्व में आजादी का आन्दोलन चलाकर देश को गुलामी से मुक्त कराया, किन्तु ‘वलीन इण्डिया’ का बापू का सपना अभी अधूरा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि महात्मा गांधी ने अपना पूरा जीवन स्वराज्य प्राप्ति के लिए अर्पित किया तथा अब समय आ गया है जब हम मातृभूमि की स्वच्छता के लिए स्वयं को समर्पित कर दें। इस संदर्भ में स्वच्छता के लिए प्रत्येक सप्ताह दो घण्टे अर्थात् प्रतिवर्ष लगभग सौ घण्टे का योगदान देने का आह्वान सभी देशवासियों से उन्होंने किया है। हर उस व्यक्ति, विशेषतः धार्मिक और राजनीतिक नेताओं, महापौरों, सरपंचों व उद्योग जगत् के अग्रजों से अपील करते हुए उन्होंने कहा है कि वे शहरों व आसपास के क्षेत्रों, गाँवों, कार्यस्थलों ओर यहाँ तक कि अपने घरों की स्वच्छता की कार्ययोजना बनाकर उसे क्रियान्वित करने में जुट जाएँ। नई दिल्ली में इण्डिया गेट पर आयोजित समारोह में अपने सम्बोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वच्छता आंदोलन को राजनीति से परे राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा से किया हुआ काम बताया।

[11] मोवाइल : आधुनिक यंत्र मानव Or, मोबाइल: वरदान या अभिशाप 

उत्तर, आधुनिक युग में विज्ञान द्वारा अनेक आश्चर्यजनक आविष्कार किये गये, जिनमें कम्प्यूटर एवं मोबाइल का विशेष महत्व है। आज के समय में मोबाइल फोन हमारे दैनिक जीवन का अहम हिस्सा बन गया है। मोबाइल ने ज्ञान-विज्ञान तथा संचार की सुविधा और भी अधिक सुगम बना दिया है। इसने मनुष्य की जीवन में अ‌द्भुत क्रांति ला दी है। प्रारम्भ में मोबाइल फोन कुछ सम्पन्न लोगों तक ही प्रचलित रहा, लेकिन अब हर व्यक्ति मोबाइल फोन रखने लगा है। भारत में मोबाइल फोन का उत्तरोतर प्रचलन बढ़ रहा है और अब मजदूर, सफाईकर्मी, किसान, खोमचे वाले आदि सभी वर्गों के लोग इसे अत्यावश्यक संचार उपकरण के रूप में अपना रहे हैं।

वास्तव में मोबाइल आजकल के समय में महत्वपूर्ण है। कई विद्यार्थी जिन्हें किसी सवालों का जवाब नहीं मिलता तो वह मोबाइल पर सर्च करके उन सवालों के जवाब आसानी से प्राप्त कर पाते हैं। इसके अलावा आज के विद्यार्थी मोबाइल पर अपने शिक्षकों से वीडियो कॉल के जरिए शिक्षा प्राप्त करते है। मोबाइल में खेल खेलने, संगीत सुनने, विवाह करवाने, नौकरी ढूँढ़ने, सामान खरीदने बेचने, होटल, रेल या हवाई जहाज की बुकिंग कराने, बिल जमा कराने आदि सभी काम किये जा सकते है। देश-विदेश के कॉलेजों में दाखिला लेने के लिए जानकारी हासिल करने व फार्म भेजने, असाध्य रोगों के इलाज के लिए डॉक्टरों से संपर्क स्थापित करने तक के कार्य इससे किये जा सकते हैं। इससे विश्व के किसी भी कोने में स्थित अधिकारी,

[12]पुस्तकालय 

उत्तर, पुस्तकालय ज्ञान की देवी माता सरस्वती का आराधना मंदिर है, जहाँ पर आराधना करके आराधक माँ सरस्वती का प्रत्यक्ष दर्शन करता है। सरस्वती की कृपा से ही अज्ञान रूपी अन्धकार नष्ट होता है, कुरीतियाँ समाप्त हो जाती है, मस्तिष्क में ज्ञान का प्रकाश होता है। अतः पुस्तकालय व्यक्ति को महान बनाने का एक उत्तम साधन है। विद्यालयों में छात्र को जो ज्ञान दिया जाता है, उसका विकास पुस्तकालय में ही होता है।

पुस्तकालय ज्ञान का वह भव्य मन्दिर है, जहाँ बैठकर हम ज्ञान और बुद्धि का विकास करते हैं। अध्ययन कक्ष में शिक्षक पथ-प्रदर्शन करते हैं, किन्तु ज्ञान का विकास पुस्तकालय में ही सम्भव है। सामान्य ज्ञान, राजनीतिक चेतना एवं साहित्यिक अभिरूचि जागृत करने के लिए पुस्तकालय ही उपयोगी साधन है। पुस्तकों द्वारा हम अपने पूर्वजों के अनुभव से परिचित होते हैं, अपने देश और समाज के सांस्कृतिक परिवेश का ज्ञान प्राप्त करते हैं और अनेक गूढ़तम रहस्यों को समझने में समर्थ होते हैं।

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है, बालक का सर्वांगीण विकास। पाठ्यक्रम में निर्धारित पुस्तको का लक्ष्य है, परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए उपयुक्त सामग्री प्रदान करना, परन्तु ज्ञान के विकास के लिए अन्य पुस्तकों का अध्ययन भी आवश्यक है। पुस्तकालय में संगृहीत विभिन्न प्रकार की पुस्तके छात्र एवं अध्यापक दोनों के ज्ञान के विकास में योग देती हैं।

[13]जीवन में खेलकूद का महत्व 

उत्तर, खेल-कूद एक अच्छा व्यायाम है और नीरस कार्यक्रम में परिवर्तन लाने के लिये यह आवश्यक है। यह विशेष रूप से बच्चों और युवकों में प्रचलित है। न केवल लड़के अपितु लड़कियों भी भिन्न-भिन्न प्रकार के खेलकूद में दिलचस्पी लेती है। यह आनन्द का साधन है जो हमें जीवन की नीरसता को भुलाने में समर्थ बनाता है। वास्तव में यह शक्ति प्रदान करने वाले पुष्टिप्रद पदार्थ की भाँति है जो किसी भी व्यक्ति को नवीन उत्साह के साथ जीवन के कर्त्तव्यों को फिर से आरम्भ करने योग्य बनाते हैं।

ये विशेषताएँ और सद्‌गुण खेलकूद के माध्यम से विकसित होते हैं। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है, यह एक प्राचीन कहावत है। एक स्वस्थ शरीर रोगमुक्त होने के कारण सदैव स्वतंत्र और आत्म-निर्भर होता है। एक सच्चा खिलाड़ी साहस से सुशोभित होता है। वह सदैव प्रतिकूल और अशुभ परिस्थितियों के विरूद्ध लड़ने का साहस रखता है। वह कभी निराश नहीं होता और आनन्द से कठिन परिस्थितियों का सामना करता है। खेल क्रीड़ाशीलता की भावना को उत्पन्न करते हैं जिसका अर्थ है मुस्कुराहट के साथ विजय-पराजय को, विपक्षी के प्रति बिना किसी द्वेष और गुणा को स्वीकार करना। एक सच्चा खिलाड़ी सदा दूसरे का मान करता है और दूसरों से इसकी आशा करता है। वह सम्मान के साथ जीना और मरना पसन्द करता है।

खेल नेतृत्व की भावना को शिक्षा देने का अवसर प्रदान करते है। निर्भयता, साहस से अपकर्म आदि दोषों और अन्याय की रोकथाम की सामर्थ्य एक नेता के लिए अनिवार्य गुण है। इन गुणों का प्रशिक्षण भी खेलों के द्वारा होता है। विद्यार्थी जीवन किसी के जीवन का बीजारोपण का समय है। यदि ये सद्‌गुण इस स्तर पर विकसित होते हैं

krishna yadav मैं डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जन्मभूमि सिवान (बिहार) का निवासी हूँ और एक समर्पित डिजिटल क्रिएटर, ब्लॉगर, एवं यूट्यूबर के रूप में कार्य कर रहा हूँ। बीते 4 वर्षों से मैं शिक्षा, सरकारी योजनाओं, रोजगार अवसरों और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक विषयों पर सटीक, विश्वसनीय और अपडेटेड जानकारी उपलब्ध कराने का कार्य कर रहा हूँ।मेरा उद्देश्य है कि डिजिटल युग में देश के हर वर्ग और क्षेत्र के नागरिक को जानकारी और संसाधनों तक समान रूप से पहुँच मिल सके। मैं मानता हूँ कि सूचना ही सशक्तिकरण की कुंजी है, और इसी विचार के साथ मैं निरंतर कार्यरत हूँ।इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से मैंने हजारों लोगों तक शिक्षा, सरकारी योजनाएं, छात्रवृत्ति, परीक्षा अपडेट्स आदि की जानकारियाँ पहुँचाई हैं, जिससे उन्हें समय पर और सही निर्णय लेने में सहायता मिली है।मुझे गर्व है कि मैं अपने राज्य और देश के विकास में डिजिटल माध्यम के द्वारा एक सकारात्मक भूमिका निभा पा रहा हूँ।

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